मानो या ना मानो, लेकिन यह खबर सौ प्रतिशत
सच है। दरअसल, १०६ साल पहले गांव के मेलो में घूमता सिनेमा
यानी टूरिंग टॉकीज का व्यवसाय धूम-धाम के साथ
चल रहा था। हर साल हर गांव में मेला होता था और इसी वजह से तंबू में फिल्में
दिखाने का व्यवसाय फल-फूल रहा था। उस जमाने में फिल्में विदेशों से आती थी और अपने
यहां पर तंबू में दिखाई जाती थी। उन दिनों अपने देश पर अंग्रेजों का राज था और
अंग्रेज अधिकारी अपने मनोरंजन के लिए विदेशों से फिल्में मंगवाते थे। ऐसे ही एक
बार भारतीय सिनेमा के जनक दादासाहेब फालके ने तंबू में फिल्म देखी और वह इतने
प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने देश में फिल्म बनाने का बिड़ा उठाया और साल १९१३
यानी १०० साल पहले फिल्म राजा हरिशचंद्र बनाई थी, जो पूरी
तरह से स्वदेशी फिल्म थी। यह फिल्म मुंबई के थिएटरों में रिलीज हुई थी।
राजा
हरिशचंद्र यह पहली भारतीय फिल्म थी, लेकिन इस
फिल्म के बाद धीरे-धीरे टूरिंग टॉकीज का व्यवसाय चौपट होना शुरु हुआ था। एक जमाने
में टूरिंग टॉकीज का व्यवसाय महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, दक्षिण भारत, उत्तर
प्रदेश और बिहार के राज्यों में हर गांव में धूम-धडा़के के साथ चल रहा था। सिर्फ
महाराष्ट्र में साल १९८५ तक २००० टूरिंग टॉकीज वाले थे और अब इनकी संख्या घटकर ३२ रह
गई है, यानी सिनेमा थिएटर में दिखाने से यह व्यवसाय पूरी तरह
से चौपट हो गया है और हजारों लोगों का रोजगार भी चौपट हो गया है।
भारतीय सिनेमा को
इस माह में १०० साल पूरे हो रहे है और इस खास मौके पर निर्माती तृप्ती भोईर व निर्देशक गजेंद्र अहिरे टुरिंग
टॉकीज पर एक खास फिल्म लेकर आ गए है और यह फिल्म पुराने जमाने की तरह तंबू में
दिखाई जाएगी। मुंबई,
पूना और गोवा में यह फिल्म १९ अप्रैल
को रिलीज हो रही है।
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